श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.85.31 
अर्ह: पूरुरिदं राज्यं य: सुत: प्रियकृत् तव।
वरदानेन शुक्र्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
पुरु आपका प्रिय पुत्र है, अतः शुक्राचार्य के वरदान के अनुसार वही इस राज्य का अधिकारी है। इस निर्णय के विरुद्ध कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता ॥31॥
 
Puru is your beloved son, therefore, according to the boon given by Shukracharya, he alone is entitled to inherit this kingdom. No answer can be given against this decision. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)