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mahabharat 1.85.16: 'इसलिए मैं इस तृष्णा को त्यागकर परब्रह्म में मन लगाऊँगा और द्वन्द्व तथा ममता से मुक्त होकर मृगों के साथ वन में विचरण करूँगा॥16॥   |   mahabharat अध्याय 1.85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.85.16 
तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम्।
निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिष्यामि मृगै: सह॥ १६॥
 
 
अनुवाद
'इसलिए मैं इस तृष्णा को त्यागकर परब्रह्म में मन लगाऊँगा और द्वन्द्व तथा ममता से मुक्त होकर मृगों के साथ वन में विचरण करूँगा॥16॥
 
'Therefore, leaving this craving behind, I will concentrate on the Supreme Lord and will be free from conflict and affection and will wander in the forest with the deer. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)