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mahabharat 1.85.14: 'जो कामना वृद्ध होने पर भी नहीं बढ़ती और जो घातक रोग है, इस कामना को त्यागना मिथ्या बुद्धि वालों के लिए बहुत कठिन है; इस कामना को त्यागने वाले को ही सुख प्राप्त होता है॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 1.85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  1.85.14 
या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत:।
योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत: सुखम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
'जो कामना वृद्ध होने पर भी नहीं बढ़ती और जो घातक रोग है, इस कामना को त्यागना मिथ्या बुद्धि वालों के लिए बहुत कठिन है; इस कामना को त्यागने वाले को ही सुख प्राप्त होता है॥ 14॥
 
'It is very difficult for those with wrong intellect to give up this desire which does not grow old even when the person grows old and which is a fatal disease; happiness is attained only by the one who gives up this desire.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)