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mahabharat 1.85.13: इस पृथ्वी पर जितने भी चावल, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए लोभ का त्याग कर देना चाहिए॥13॥   |   mahabharat अध्याय 1.85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.85.13 
यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।
एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात् तृष्णां परित्यजेत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
इस पृथ्वी पर जितने भी चावल, जौ, सोना, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिलकर भी एक मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए लोभ का त्याग कर देना चाहिए॥13॥
 
‘All the rice, barley, gold, animals and women on this earth are not enough even for a single human being. Therefore, greed should be given up.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)