ऐसा कहकर महातपस्वी ययाति ने शुक्राचार्य का स्मरण किया और महापुरुष पुरु को अपनी वृद्धावस्था देकर उनकी युवावस्था ले ली।
Saying this, the great ascetic Yayati remembered Shukracharya and gave his old age to the great Puru and took his youth.
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने चतुरशीतितमोऽध्याय:॥ ८४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३५ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥