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mahabharat 1.83.6: शर्मिष्ठा बोली - शुचिस्मिते! वह अपने तप और तेज से सूर्य के समान चमक रहा था। उसे देखकर मुझे उससे कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ।   |   mahabharat अध्याय 1.83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.83.6 
शर्मिष्ठोवाच
तपसा तेजसा चैव दीप्यमानं यथा रविम्।
तं दृष्ट्वा मम सम्प्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छुचिस्मिते॥ ६॥
 
 
अनुवाद
शर्मिष्ठा बोली - शुचिस्मिते! वह अपने तप और तेज से सूर्य के समान चमक रहा था। उसे देखकर मुझे उससे कुछ पूछने का साहस नहीं हुआ।
 
Sharmishtha said - Shuchismite! He was shining like the Sun with his austerity and brilliance. Seeing him I did not have the courage to ask him anything.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)