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श्लोक 1.83.41-42  |
शुक्र उवाच
संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज।
मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि॥ ४१॥
वयो दास्यति ते पुत्रो य: स राजा भविष्यति।
आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| शुक्राचार्य बोले - हे नहुषनंदन! भक्तिपूर्वक मेरा स्मरण करके तुम अपनी वृद्धावस्था को इच्छानुसार किसी दूसरे के शरीर में स्थानांतरित कर सकोगे। उस स्थिति में तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी जवानी दे देगा, वह राजा बनेगा और दीर्घायु, यशस्वी और बहुत सन्तान वाला भी होगा। ॥41-42॥ |
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| Shukracharya said - O son of Nahushanandan! By thinking of me with devotion, you will be able to transfer your old age to someone else's body as per your wish. In that case, you will not commit any sin. The son who (happily) gives you his youth will become the king and will also be long-lived, famous and blessed with many children. ॥ 41-42॥ |
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने त्र्यशीतितमोऽध्याय:॥ ८३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/२ श्लोक हैं) |
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