श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.83.38 
ययातिरुवाच
अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह।
प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं न विशेच्च माम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले, 'हे भृगु महाराज! युवावस्था में देवयानी के साथ रहकर मैं संतुष्ट नहीं हूँ; अतः हे ब्रह्मन्! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मेरे शरीर में वृद्धावस्था प्रवेश ही न करे।'
 
Yayati said, 'O great one of Bhrigu! I am not satisfied with living with Devayani in my youth; therefore, O Brahman! Kindly shower such kindness on me that old age does not enter my body.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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