श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 83: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.83.36 
शुक्र उवाच
नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव।
मिथ्याचारस्य धर्मेषु चौर्यं भवति नाहुष॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
शुक्राचार्य बोले - राजन! इस विषय में भी तुम्हें मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। हे नहुषनंदन! जो मनुष्य धर्म के साथ अन्याय करता है, उसे चोरी का पाप लगता है। 36.
 
Shukracharya said - King! You should have waited for my orders in this matter as well; because you are under me. O son of Nahushanandan! A man who misbehaves with religion incurs the sin of theft. 36.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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