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mahabharat 1.81.32: ययाति बोले - भार्गव ब्राह्मण! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाह में जाति-पाँति से उत्पन्न यह प्रत्यक्ष अनिष्ट मुझे स्पर्श न करे॥32॥   |   mahabharat अध्याय 1.81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.81.32 
ययातिरुवाच
अधर्मो न स्पृशेदेष महान् मामिह भार्गव।
वर्णसंकरजो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - भार्गव ब्राह्मण! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाह में जाति-पाँति से उत्पन्न यह प्रत्यक्ष अनिष्ट मुझे स्पर्श न करे॥32॥
 
Yayati said – Bhargava Brahmin! I ask for this boon from you that this visible evil caused by caste mixing should not touch me in this marriage. 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)