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mahabharat 1.81.30: देवयानी बोली, "पिताजी! ये नहुष के पुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकट के समय मेरा हाथ थामा था। मैं आपको प्रणाम करती हूँ। कृपया मुझे इनकी सेवा में सौंप दीजिए। मैं इनके अतिरिक्त इस संसार में किसी अन्य पति को स्वीकार नहीं करूँगी।"   |   mahabharat अध्याय 1.81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.81.30 
देवयान्युवाच
राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत्।
नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
देवयानी बोली, "पिताजी! ये नहुष के पुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकट के समय मेरा हाथ थामा था। मैं आपको प्रणाम करती हूँ। कृपया मुझे इनकी सेवा में सौंप दीजिए। मैं इनके अतिरिक्त इस संसार में किसी अन्य पति को स्वीकार नहीं करूँगी।"
 
Devayani said— Father! This is King Yayati, son of Nahusha. He held my hand in times of crisis. I salute you. Please surrender me to his service. I will not accept any other husband in this world except him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)