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mahabharat 1.81.23: ययाति बोले- देवि! बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह ब्राह्मण को क्रोध में भरे हुए विषैले सर्प और सब ओर से जलती हुई अग्नि से भी अधिक भयंकर और भयंकर समझे॥23॥   |   mahabharat अध्याय 1.81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 81: सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीकी उनके साथ बातचीत तथा विवाह  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.81.23 
ययातिरुवाच
क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।
दुराधर्षतरो विप्रो ज्ञेय: पुंसा विजानता॥ २३॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले- देवि! बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह ब्राह्मण को क्रोध में भरे हुए विषैले सर्प और सब ओर से जलती हुई अग्नि से भी अधिक भयंकर और भयंकर समझे॥23॥
 
Yayati said – Goddess! A wise man should consider a Brahmin as more dangerous and dangerous than a poisonous snake filled with anger and a fire burning from all sides. 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)