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mahabharat 1.80.9: शुक्राचार्य बोले, "हे दैत्यों! तुम चाहे समुद्र में प्रवेश करो या चारों दिशाओं में भाग जाओ; मैं अपनी पुत्री के प्रति किसी भी अप्रिय व्यवहार को सहन नहीं कर सकता, क्योंकि वह मुझे अत्यंत प्रिय है।"   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.80.9 
शुक्र उवाच
समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुरा:।
दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे॥ ९॥
 
 
अनुवाद
शुक्राचार्य बोले, "हे दैत्यों! तुम चाहे समुद्र में प्रवेश करो या चारों दिशाओं में भाग जाओ; मैं अपनी पुत्री के प्रति किसी भी अप्रिय व्यवहार को सहन नहीं कर सकता, क्योंकि वह मुझे अत्यंत प्रिय है।"
 
Shukracharya said, "O demons! You may enter the ocean or run away in all four directions; I cannot tolerate any unpleasant behaviour towards my daughter because she is very dear to me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)