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mahabharat 1.80.5: 'वृषपर्वन्! मेरी बात ध्यान से सुनो, पहले तो तुमने एक ऐसे ब्राह्मण को मारा जो वध के योग्य नहीं था और अब मेरी पुत्री देवयानी को मारने के लिए कुएँ में धकेल दिया है। इन दोनों हत्याओं के कारण मैं तुम्हें और तुम्हारे भाइयों को त्याग दूँगा। राजन! मैं तुम्हारे राज्य में और तुम्हारे साथ एक क्षण भी नहीं रह सकूँगा।'   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.80.5 
वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम।
वृषपर्वन् निबोधेदं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्।
स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्ष्यामि त्वया सह॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'वृषपर्वन्! मेरी बात ध्यान से सुनो, पहले तो तुमने एक ऐसे ब्राह्मण को मारा जो वध के योग्य नहीं था और अब मेरी पुत्री देवयानी को मारने के लिए कुएँ में धकेल दिया है। इन दोनों हत्याओं के कारण मैं तुम्हें और तुम्हारे भाइयों को त्याग दूँगा। राजन! मैं तुम्हारे राज्य में और तुम्हारे साथ एक क्षण भी नहीं रह सकूँगा।'
 
'Vrishparvan! Listen to me carefully, first you killed a Brahmin who was not fit to be killed and now you have pushed my daughter Devayani into the well to kill her. Because of these two murders, I will abandon you and your brothers. King! I will not be able to stay even for a moment in your kingdom and with you. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)