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mahabharat 1.80.3: ‘यदि पाप से अर्जित धन का दुष्परिणाम स्वयं पर दिखाई न दे, तो पाप से अर्जित उस धन के उपभोग से पुत्र-पौत्रादि पर अवश्य दिखाई देगा। जैसे खाया हुआ भारी भोजन पेट में कष्ट उत्पन्न करता है, यदि तुरन्त नहीं, तो कुछ समय बाद, उसी प्रकार किए हुए पाप भी अपना फल अवश्य देते हैं।’॥3॥   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.80.3 
पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति।
फलत्येव ध्रुवं पापं गुरु भुक्तमिवोदरे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
‘यदि पाप से अर्जित धन का दुष्परिणाम स्वयं पर दिखाई न दे, तो पाप से अर्जित उस धन के उपभोग से पुत्र-पौत्रादि पर अवश्य दिखाई देगा। जैसे खाया हुआ भारी भोजन पेट में कष्ट उत्पन्न करता है, यदि तुरन्त नहीं, तो कुछ समय बाद, उसी प्रकार किए हुए पाप भी अपना फल अवश्य देते हैं।’॥3॥
 
‘If the ill-effects of the wealth earned through sins are not visible on oneself, then they will definitely be visible on the sons or grandchildren due to the consumption of that wealth earned through sin. Just as the heavy food eaten causes trouble in the stomach, if not immediately, then after some time, similarly the sins committed also definitely give their results.'॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)