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mahabharat 1.80.27: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानी से ऐसा सुनकर महाप्रतापी द्विज शुक्राचार्य समस्त दैत्यों द्वारा पूजित और प्रसन्न होकर नगर में आये॥27॥   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.80.27 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तो दुहित्रा स द्विजश्रेष्ठो महायशा:।
प्रविवेश पुरं हृष्ट: पूजित: सर्वदानवै:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपनी पुत्री देवयानी से ऐसा सुनकर महाप्रतापी द्विज शुक्राचार्य समस्त दैत्यों द्वारा पूजित और प्रसन्न होकर नगर में आये॥27॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Hearing this from his daughter Devayani, Shukracharya, the great and famous Dvija, entered the city, worshiped and pleased by all the demons. 27॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्यानेऽशीतितमोऽध्याय:॥ ८०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८०॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)