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mahabharat 1.80.23: देवयानी बोली, "ओह! मैं तो भिक्षा मांगने वाले तथा दान लेने वाले भिक्षुक की पुत्री हूँ और तुम उस महापुरुष की पुत्री हो, जिसकी प्रशंसा मेरे पिता करते हैं; फिर तुम मेरी दासी कैसे रह सकती हो?"   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  1.80.23 
देवयान्युवाच
स्तुवतो दुहिताहं ते याचत: प्रतिगृह्णत:।
स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि॥ २३॥
 
 
अनुवाद
देवयानी बोली, "ओह! मैं तो भिक्षा मांगने वाले तथा दान लेने वाले भिक्षुक की पुत्री हूँ और तुम उस महापुरुष की पुत्री हो, जिसकी प्रशंसा मेरे पिता करते हैं; फिर तुम मेरी दासी कैसे रह सकती हो?"
 
Devayani said, "Oh! I am the daughter of a beggar who praises and accepts alms and you are the daughter of that great man whom my father praises; then how can you remain my maid?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)