श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.80.2 
नाधर्मश्चरितो राजन् सद्य: फलति गौरिव।
शनैरावर्त्यमानो हि कर्तुर्मूलानि कृन्तति॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! किए हुए पापों का फल तुरन्त नहीं मिलता। जैसे गाय की देखभाल करने पर कुछ समय बाद वह बच्चे देती है और दूध देती है, अथवा भूमि जोतने और बीज बोने पर पौधा उगता है और समय आने पर फल देता है, उसी प्रकार किए हुए पाप धीरे-धीरे कर्ता की जड़ को काट देते हैं॥ 2॥
 
‘O King! The result of the sins committed does not come immediately. Just as a cow is taken care of and after some time it gives birth and milk or after ploughing the land and sowing seeds, the plant grows and gives fruit in due course of time, similarly the sins committed gradually cut the root of the doer.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)