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mahabharat 1.80.15: वृषपर्वा ने शुद्ध मुस्कान के साथ कहा, "हे देवयानी! तुम जो भी चाहो, चाहे वह दुर्लभ ही क्यों न हो, मैं तुम्हें अवश्य दूँगा।"   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.80.15 
वृषपर्वोवाच
यं काममभिकामासि देवयानि शुचिस्मिते।
तत् तेऽहं सम्प्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
वृषपर्वा ने शुद्ध मुस्कान के साथ कहा, "हे देवयानी! तुम जो भी चाहो, चाहे वह दुर्लभ ही क्यों न हो, मैं तुम्हें अवश्य दूँगा।"
 
Vrishparva said, "O Devayani with a pure smile! Whatever you desire, even if it is rare, I will certainly give it to you." 15.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)