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mahabharat 1.80.13: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! शुक्राचार्य के ऐसा कहने पर वृषपर्वान ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वे दोनों देवयानी के पास गए और महाकवि शुक्राचार्य ने वृषपर्वा द्वारा कही हुई सारी बातें कह सुनाईं॥13॥   |   mahabharat अध्याय 1.80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 80: शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.80.13 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकवि:।
देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थं प्राह भार्गव:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! शुक्राचार्य के ऐसा कहने पर वृषपर्वान ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वे दोनों देवयानी के पास गए और महाकवि शुक्राचार्य ने वृषपर्वा द्वारा कही हुई सारी बातें कह सुनाईं॥13॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! When Shukracharya said this, Vrishaparvan accepted his orders by saying 'Tathaastu'. After that both of them went to Devayani and the great poet Shukracharya narrated all the things said by Vrishparva. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)