Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.79.d8-13: मैं तीनों लोकों में इससे अधिक दुःखदायी कुछ भी नहीं मानता। इसमें संदेह नहीं कि कठोर वचन हृदय को छेद देते हैं। कठोर वचन बोलने वालों के स्वजन और मित्र भी उनसे प्रेम नहीं करते। जो मनुष्य दरिद्र होकर अपने शत्रुओं की तेजस्वी देवी लक्ष्मी की पूजा करता है, उसका मर जाना ही अच्छा है; ऐसा ही विद्वान पुरुष अनुभव करते हैं॥13॥ | mahabharat अध्याय 1.79: शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
न ह्यतो दुष्करतरं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु।
(नि:संशयो विशेषेण परुषं मर्मकृन्तनम्।
सुहृन्मित्रजनास्तेषु सौहृदं न च कुर्वते॥ )
य: सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्री: पर्युपासते।
मरणं शोभनं तस्य इति विद्वज्जना विदु:॥ १३॥
अनुवाद
मैं तीनों लोकों में इससे अधिक दुःखदायी कुछ भी नहीं मानता। इसमें संदेह नहीं कि कठोर वचन हृदय को छेद देते हैं। कठोर वचन बोलने वालों के स्वजन और मित्र भी उनसे प्रेम नहीं करते। जो मनुष्य दरिद्र होकर अपने शत्रुओं की तेजस्वी देवी लक्ष्मी की पूजा करता है, उसका मर जाना ही अच्छा है; ऐसा ही विद्वान पुरुष अनुभव करते हैं॥13॥
I do not consider anything in the three worlds to be more painful than this. There is no doubt that harsh words pierce the heart. Even the relatives and friends of those who speak harsh words do not love them. It is better for a person who is poor and worships the shining goddess Lakshmi of his enemies to die; this is what learned men feel.॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥