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mahabharat 1.79.5: जो अपने क्रोध को वश में रखता है, निन्दा सहन करता है और दूसरों के सताने पर भी दुःखी नहीं होता, वही सम्पूर्ण पुरुषार्थों में समर्थ है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.79: शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 79: शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.79.5 
य: संधारयते मन्युं योऽतिवादांस्तितिक्षते।
यश्च तप्तो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जो अपने क्रोध को वश में रखता है, निन्दा सहन करता है और दूसरों के सताने पर भी दुःखी नहीं होता, वही सम्पूर्ण पुरुषार्थों में समर्थ है ॥5॥
 
He who controls his anger, tolerates criticism and does not get sad even when others harass him, is the one who is capable of all efforts. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)