Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.79.4: जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली को त्याग देता है, वैसे ही जो मनुष्य यहाँ उत्पन्न होने वाले क्रोध को क्षमा करके त्याग देता है, वह उत्तम पुरुष माना जाता है ॥4॥ | mahabharat अध्याय 1.79: शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
य: समुत्पतितं क्रोधं क्षमयेह निरस्यति।
यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ४॥
अनुवाद
जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली को त्याग देता है, वैसे ही जो मनुष्य यहाँ उत्पन्न होने वाले क्रोध को क्षमा करके त्याग देता है, वह उत्तम पुरुष माना जाता है ॥4॥
Just like a snake sheds its old skin, similarly a person who sheds the anger that arises here by forgiving is considered a good man. ॥ 4॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥