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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 78: देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यजीके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.78.41 
वैशम्पायन उवाच
एवं विषादमापन्नां मन्युना सम्प्रपीडिताम्।
वचनैर्मधुरै: श्लक्ष्णै: सान्त्वयामास तां पिता॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं: जनमेजय! देवयानी क्रोध और पश्चाताप से अत्यन्त व्याकुल हो रही थी, तब उसके पिता ने उसे मधुर वचनों से सान्त्वना दी।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Devayani was thus deeply distressed by anger and remorse, when her father consoled her with sweet words.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्यानेऽष्टसप्ततितमोऽध्याय:॥ ७८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)