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mahabharat 1.78.36: हे प्रिये! यदि मैं सचमुच स्तुति करने वाले और दान लेने वाले की पुत्री हूँ, तो मैं अपनी सेवा से शर्मिष्ठा को प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखी से कही थी।   |   mahabharat अध्याय 1.78: देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यजीके साथ वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 78: देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यजीके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.78.36 
यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णत:।
प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता तु सखी मया॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! यदि मैं सचमुच स्तुति करने वाले और दान लेने वाले की पुत्री हूँ, तो मैं अपनी सेवा से शर्मिष्ठा को प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखी से कही थी।
 
O dear! If I am really the daughter of the one who praises and accepts gifts, then I will please Sharmishtha by my services. I had told this to my friend.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)