देवयान्युवाच
गुरुपुत्रस्य पुत्रो वै न त्वं पुत्रश्च मे पितु:।
तस्मात् पूज्यश्च मान्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम॥ ९॥
असुरैर्हन्यमाने च कच त्वयि पुन: पुन:।
तदा प्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमद्य स्मरस्व मे॥ १०॥
अनुवाद
देवयानी बोली- द्विजोत्तम! तुम मेरे पिता के गुरुपुत्र के पुत्र हो, मेरे पिता के नहीं; अतः तुम मेरे लिए भी पूजनीय और आदर के योग्य हो। कच! जब से दैत्यों ने तुम्हें बार-बार मारा है, तब से मैं तुम्हारे प्रति जो प्रेम रखती हूँ, उसे आज स्मरण करो॥9-10॥
Devayani said— Dwijottam! You are the son of my father's Guruputra, not my father; hence you are worthy of worship and respect for me too. Kach! Remember today the love I have had for you since the time the demons killed you repeatedly.॥ 9-10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥