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mahabharat 1.77.7: भद्रे! महात्मा भार्गव को तुम प्राणों से भी अधिक प्रिय हो, गुरु की पुत्री होने के कारण तुम धर्म की दृष्टि से मेरे द्वारा सदैव पूजित हो॥7॥   |   mahabharat अध्याय 1.77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.77.7 
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्गवस्य महात्मन:।
त्वं भद्रे धर्मत: पूज्या गुरुपुत्री सदा मम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
भद्रे! महात्मा भार्गव को तुम प्राणों से भी अधिक प्रिय हो, गुरु की पुत्री होने के कारण तुम धर्म की दृष्टि से मेरे द्वारा सदैव पूजित हो॥7॥
 
Bhadre! To Mahatma Bhargava, you are dearer than life, being the daughter of Guru, you are always worshiped by me from the point of view of religion. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)