श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.77.3 
ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्य: पितुर्मम महायशा:।
तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पति:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे मेरे पिता परम विख्यात महर्षि अंगिरा का आदर करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पिता बृहस्पतिजी का भी मैं आदर करता हूँ।॥3॥
 
‘Just as the highly renowned sage Angira is respected by my father, in the same way your father Brihaspatiji is respected and revered by me.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)