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mahabharat 1.77.15: अब मैं जा रहा हूँ, अतः आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ - आपकी अनुमति चाहता हूँ, मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए, जिससे मार्ग में मेरा कल्याण हो। वार्तालाप के समय कभी-कभी धर्म के सद्ग्रन्थों में रहते हुए मेरा स्मरण कीजिए तथा सदैव सजग और सतर्क रहकर मेरे गुरुदेव की सेवा में तत्पर रहिए॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 1.77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.77.15 
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि।
अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे।
अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय गुरुं मम॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अब मैं जा रहा हूँ, अतः आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ - आपकी अनुमति चाहता हूँ, मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए, जिससे मार्ग में मेरा कल्याण हो। वार्तालाप के समय कभी-कभी धर्म के सद्ग्रन्थों में रहते हुए मेरा स्मरण कीजिए तथा सदैव सजग और सतर्क रहकर मेरे गुरुदेव की सेवा में तत्पर रहिए॥ 15॥
 
Now I am going, so I am asking you – I want your permission, give me your blessings so that I may be blessed on the way. In the context of conversations, remember me sometimes while being in the good books of Dharma and always remain alert and vigilant and remain engaged in the service of my Gurudev.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)