श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना  »  श्लोक 12-14
 
 
श्लोक  1.77.12-14 
कच उवाच
अनियोज्ये नियोगे मां नियुनङ्क्षि शुभव्रते।
प्रसीद सुभ्रु त्वं मह्यं गुरोर्गुरुतरा शुभे॥ १२॥
यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने।
तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि॥ १३॥
भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोच: सुमध्यमे।
सुखमस्म्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम॥ १४॥
 
 
अनुवाद
कच ने कहा - उत्तम व्रतों का पालन करने वाली सुन्दरी! तुम मुझसे ऐसा कार्य करा रही हो जो बिलकुल भी उचित नहीं है। शुभ! तुम्हें मुझ पर प्रसन्न होना चाहिए। तुम मेरे लिए गुरु से भी बढ़कर हो। बड़े-बड़े नेत्रों और चंद्रमा के समान मुख वाली भामिनी! तुम जिस शुक्राचार्य के उदर में रही हो, उसी के गर्भ में मैं भी रह चुका हूँ। अतः हे भद्रे! धर्म की दृष्टि से तुम मेरी बहन हो। अतः हे सुमध्यमे! मुझसे ऐसी बातें मत कहो। कल्याणी! मैं तुम्हारे यहाँ बहुत सुख से रह चुका हूँ। मेरे मन में तुम्हारे प्रति किंचित मात्र भी क्रोध नहीं है॥12-14॥
 
Kach said - Beautiful lady who observes excellent vows! You are making me do such a work which is not at all appropriate. Shubh! You should be pleased with me. You are more important than even a Guru for me. Bhaamini with big eyes and face like the moon! I have also lived in the stomach of Shukracharya in which you have lived. Therefore, Bhadre! From the viewpoint of Dharma, you are my sister. Therefore, Sumadhyme! Do not say such things to me. Kalyani! I have lived very happily at your place. I do not have even a bit of anger towards you.॥ 12-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)