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mahabharat 1.77.11: हमारी मित्रता और प्रेम के अवसर पर आपको मेरी महान भक्ति का ज्ञान हो गया है। आप धर्म के ज्ञाता हैं। मैं एक अबोध और अबला स्त्री हूँ जो आपके प्रति समर्पित है। आपका मुझे त्यागना उचित नहीं है॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 1.77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 77: देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.77.11 
सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम्।
न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हमारी मित्रता और प्रेम के अवसर पर आपको मेरी महान भक्ति का ज्ञान हो गया है। आप धर्म के ज्ञाता हैं। मैं एक अबोध और अबला स्त्री हूँ जो आपके प्रति समर्पित है। आपका मुझे त्यागना उचित नहीं है॥ 11॥
 
You have come to know about my great devotion on the occasion of our friendship and love. You are the knower of religion. I am an innocent and helpless woman who has devotion towards you. It is not right for you to abandon me.॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)