श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  1.76.69 
इतीदमुक्त्वा स महानुभाव-
स्तपोनिधीनां निधिरप्रमेय:।
तान् दानवान् दैवविमूढबुद्धी-
निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
ऐसा कहकर तप के निधियों के निधि, अथाह बलशाली शुक्राचार्य ने उन दैत्यों को बुलाया जिनकी बुद्धि भगवान् ने मोहित कर ली थी और इस प्रकार कहा -॥69॥
 
Having said this, Shukraacharya, the treasure of treasures of austerities, the immeasurable powerful one, called those demons whose intellect had been deluded by the god and said thus -॥ 69॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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