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श्लोक 1.76.68  |
मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां
मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके।
सन्तो विप्रा: शुश्रुवांसो गुरूणां
देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे॥ ६८॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मेरे द्वारा निर्धारित यह मर्यादा भी शास्त्रों में वर्णित ब्राह्मण-धर्म की मर्यादा में सम्मिलित हो और सम्पूर्ण जगत् को इसे स्वीकार करना चाहिए। समस्त जगत् के संत, ब्राह्मण, गुरुओं के अधीन अध्ययन करने वाले शिष्य, देवता और मनुष्य मेरे द्वारा निर्धारित इस मर्यादा को ध्यानपूर्वक सुनें।’॥68॥ |
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| ‘This limit set by me should also be included in the limits of Brahmin-dharma prescribed in the scriptures and it should be accepted by the entire world. The saints, Brahmins, disciples studying under the Gurus, Gods and people of the entire world should listen to this limit set by me very carefully.’॥ 68॥ |
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