श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.76.67 
यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि-
न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धि:।
अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या-
दस्मिंल्लोके गर्हित: स्यात् परे च॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
‘आज से इस संसार में जो भी मंदबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानवश भी मदिरापान करेगा, वह धर्म से भ्रष्ट होकर ब्रह्महत्या के पाप का भागी होगा और इस लोक तथा परलोक दोनों में निन्दित होगा।’ 67॥
 
'From today onwards, any dull-witted Brahmin in this world who drinks alcohol even out of ignorance will be corrupted by religion and will be guilty of the sin of Brahmahatya and will be condemned in both this world and the next world.' 67॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas