श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 65-66
 
 
श्लोक  1.76.65-66 
वैशम्पायन उवाच
सुरापानाद् वञ्चनां प्राप्य विद्वान्
संज्ञानाशं चैव महातिघोरम्।
दृष्ट्वा कचं चापि तथाभिरूपं
पीतं तदा सुरया मोहितेन॥ ६५॥
समन्युरुत्थाय महानुभाव-
स्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षु:।
सुरापानं प्रति संजातमन्यु:
काव्य: स्वयं वाक्यमिदं जगाद॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'हे जनमेजय! विद्वान शुक्राचार्य मदिरा पीकर मोहग्रस्त हो गए थे और उस अत्यन्त भयंकर अवस्था को पहुँच गए थे जिसमें कोई भी होश नहीं रहता। मदिरा से मोहित होने के कारण उन्होंने अपने प्रिय शिष्य ब्राह्मण कुमार कच को, जो उनकी इच्छानुसार आचरण करता था, मदिरापान करा दिया था। यह सब देखकर और सोचकर महाकविपुत्र शुक्र को क्रोध आ गया। उनके मन में मदिरापान के प्रति क्रोध और घृणा का भाव उत्पन्न हो गया और ब्राह्मणों का हित करने की इच्छा से उन्होंने स्वयं इस प्रकार कहा -॥ 65-66॥
 
Vaishampayana says, 'O Janamejaya! The learned Shukracharya was deceived by drinking wine and had reached a very dreadful state in which one does not remain conscious at all. Due to being fascinated by wine, he had drunk his beloved disciple, Brahmin Kumar Kacha, who used to behave according to his will. Seeing and thinking all this, the great poet's son Shukra became angry. A feeling of anger and hatred towards drinking wine arose in his mind and with the desire to do good to the Brahmins, he himself declared as follows -॥ 65-66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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