श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  1.76.64 
ऋतस्य दातारमनुत्तमस्य
निधिं निधीनामपि लब्धविद्या:।
ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं
पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठा:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
‘जो लोग सम्पूर्ण वेदों के उत्तम ज्ञान के दाता और समस्त विद्याओं के आश्रय पूज्य गुरुदेव का आदर नहीं करते, वे उनसे ज्ञान प्राप्त करके भी आदरहीन होकर पापमय लोकों-नरकों में जाते हैं।’॥64॥
 
‘Those who do not respect the revered Gurudev, the giver of the best knowledge of the complete Vedas and the support of all learning, even after receiving knowledge from him, they go to the sinful worlds – hells, without any respect.’॥ 64॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd