श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.76.58 
शुक्र उवाच
संसिद्धरूपोऽसि बृहस्पते: सुत
यत् त्वां भक्तं भजते देवयानी।
विद्यामिमां प्राप्नुहि जीविनीं त्वं
न चेदिन्द्र: कचरूपी त्वमद्य॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
शुक्राचार्य बोले- हे बृहस्पतिपुत्र कच! अब तुम सिद्ध हो गए हो, क्योंकि तुम देवयानी के भक्त हो और वह तुम्हें चाहती है। यदि तुम कच रूपी इन्द्र नहीं हो, तो मुझसे मृतसंजीवनी विद्या ग्रहण करो। 58.
 
Shukracharya said— O son of Brihaspati, Kach! Now you have become a Siddha, because you are a devotee of Devayani and she wants you. If you are not Indra in the form of Kach, then take the knowledge of Mritsanjeevani from me. 58.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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