श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  1.76.57 
देवयान्युवाच
द्वौ मां शोकावग्निकल्पौ दहेतां
कचस्य नाशस्तव चैवोपघात:।
कचस्य नाशे मम नास्ति शर्म
तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्ता॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
देवयानी बोली- "पिताजी! कचक का विनाश और आपकी मृत्यु, ये दोनों दुःख मुझे अग्नि के समान जला देंगे। कचक का नाश होने पर मुझे शांति नहीं मिलेगी और आपके मारे जाने पर मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी।"
 
Devayani said— Father! The destruction of Kachaka and your death—both these griefs will burn me like fire. I will not get peace if Kachaka is destroyed and I will not be able to survive if you are killed.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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