श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  1.76.55 
असुरै: सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो
हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य।
ब्राह्मीं मायां चासुरीं विप्र मायां
त्वयि स्थिते कथमेवातिवर्तेत्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
आचार्यपाद! दैत्यों ने मुझे मारकर मेरे शरीर को जलाकर चूर्ण बना लिया। फिर उसे मदिरा में मिलाकर आपको पिला दिया! ब्राह्मण! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैव - तीनों प्रकार की मायाओं को जानते हैं। आपके रहते कोई इन मायाओं का उल्लंघन कैसे कर सकता है?॥ 55॥
 
Acharyapad! The demons killed me and burnt my body and made it into powder. Then they mixed it in wine and made you drink it! Brahmin! You know all the three types of illusions - Brahmi, Asuri and Daiv. How can anyone violate these illusions in your presence?॥ 55॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas