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श्लोक 1.76.53  |
वैशम्पायन उवाच
तमब्रवीत् केन पथोपनीत-
स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र॥ ५३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं - उसकी वाणी सुनकर शुक्राचार्य ने पूछा - 'हे ब्राह्मण! आप किस मार्ग से मेरे उदर में आकर बस गए? मुझे ठीक-ठीक बताइए।'॥53॥ |
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| Vaishmpayana says - On hearing his voice, Shukracharya asked - 'O Brahmin! By which path did you come and settle in my stomach? Tell me exactly.'॥ 53॥ |
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