श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  1.76.53 
वैशम्पायन उवाच
तमब्रवीत् केन पथोपनीत-
स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - उसकी वाणी सुनकर शुक्राचार्य ने पूछा - 'हे ब्राह्मण! आप किस मार्ग से मेरे उदर में आकर बस गए? मुझे ठीक-ठीक बताइए।'॥53॥
 
Vaishmpayana says - On hearing his voice, Shukracharya asked - 'O Brahmin! By which path did you come and settle in my stomach? Tell me exactly.'॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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