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mahabharat 1.76.52: ये उग्र स्वभाव वाले राक्षस मुझे ब्राह्मणत्व से गिराना चाहते हैं। इसीलिए ये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पाप का फल यहाँ अवश्य ही दिखाई देगा। ब्राह्मण की हत्या से कौन नहीं जलेगा, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो?॥ 52॥   |   mahabharat अध्याय 1.76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  1.76.52 
अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा-
स्ते मां यथा व्यभिचरन्ति नित्यम्।
अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्त:
कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
ये उग्र स्वभाव वाले राक्षस मुझे ब्राह्मणत्व से गिराना चाहते हैं। इसीलिए ये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पाप का फल यहाँ अवश्य ही दिखाई देगा। ब्राह्मण की हत्या से कौन नहीं जलेगा, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो?॥ 52॥
 
‘These fierce-natured demons want to bring me down from my brahminhood. That is why they are behaving against me every day. The result of this sin will surely be seen here. Who will not be burnt by the killing of a brahmin, even if it is Indra?॥ 52॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)