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श्लोक 1.76.51  |
वैशम्पायन उवाच
स पीडितो देवयान्या महर्षि:
समाह्वयत् संरम्भाच्चैव काव्य:।
असंशयं मामसुरा द्विषन्ति
ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! देवयानी के वचनों से दुःखी महर्षि शुक्राचार्य ने कच को बुलाया और दैत्यों के प्रति क्रोधपूर्वक बोले - 'इसमें कोई संदेह नहीं कि दैत्य मुझसे द्वेष करते हैं। इसीलिए ये लोग यहाँ आने वाले मेरे शिष्यों को मार डालते हैं॥ 51॥ |
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| Vaishampayana says - Janamejaya! Maharishi Shukracharya, saddened by Devayani's words, called Kacha and said in anger towards the demons - 'There is no doubt that the demons hate me. That is why these people kill my disciples who come here.॥ 51॥ |
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