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mahabharat 1.76.27-28: इस प्रकार कच ने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए पाँच सौ वर्ष वहीं बिता दिए। तब राक्षसों को यह बात पता चली। तत्पश्चात, कच को वन के एकांत भाग में अकेले गाय चराते देखकर, बृहस्पति के प्रति ईर्ष्या और संजीवनी विद्या की रक्षा के क्रोध से भरकर, राक्षसों ने उसे मार डाला।   |   mahabharat अध्याय 1.76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  1.76.27-28 
पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो व्रतम्।
तत्रातीयुरथो बुद्‍ध्वा दानवास्तं तत: कचम्॥ २७॥
गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येकममर्षिता:।
जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषाद् विद्यारक्षार्थमेव च॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कच ने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए पाँच सौ वर्ष वहीं बिता दिए। तब राक्षसों को यह बात पता चली। तत्पश्चात, कच को वन के एकांत भाग में अकेले गाय चराते देखकर, बृहस्पति के प्रति ईर्ष्या और संजीवनी विद्या की रक्षा के क्रोध से भरकर, राक्षसों ने उसे मार डाला।
 
In this manner, Kacha spent five hundred years there observing the vow of celibacy. Then the demons came to know of this. Thereafter, seeing Kacha grazing cows alone in a secluded part of the forest, the demons, filled with envy for Brihaspati and anger to protect the Sanjivani Vidya, killed him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)