श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.76.21 
शुक्र उवाच
कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वच:।
अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पति:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
शुक्राचार्य बोले - कच! तुम्हारा स्वागत है; मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे आदर के पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा आदर-सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर से मैं बृहस्पति का आदर करूँगा।
 
Shukracharya said - Kach! You are most welcome; I accept your request. You are worthy of my respect, so I will honour and respect you. Your respect will lead to my honouring Brihaspati.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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