श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.76.16 
शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च।
देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘यदि तुम अपने उत्तम स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार और संयम से देवयानी को संतुष्ट करोगे तो तुम्हें अवश्य ही वह ज्ञान प्राप्त होगा।’॥16॥
 
‘If you satisfy Devayani by your good nature, generosity, sweet behavior, good conduct and self-control, you will certainly acquire that knowledge.’॥ 16॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas