श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 76: कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  1.76.12-13 
भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु न: साह्यमुत्तमम्।
या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि॥ १२॥
शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ् नो भविष्यसि।
वृषपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विज:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्मन्! हम आपके सेवक हैं। कृपया हमें स्वीकार करें और हमारी उत्तम प्रकार से सहायता करें। अत्यन्त तेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्य के पास जो मृतसंजीवनी विद्या है, उसे सीखकर यहाँ ले आएँ। इससे आप हम देवताओं के साथ यज्ञ में भाग ले सकेंगे। राजा वृषपर्वा के पास आपको महाबली शुक्राचार्य के दर्शन प्राप्त होंगे।'॥12-13॥
 
'Brahman! We are your servants. Please accept us and help us in the best way. Learn the Mritsanjeevani Vidya which is with the extremely brilliant Brahmin Shukracharya and bring it here. This will enable you to participate in the Yagya along with us gods. You may get the darshan of the great Brahmin Shukracharya near King Vrishparva.'॥ 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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