श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 75: दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  1.75.51 
पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।
नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
यदि रत्नों से भरी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा सोना, सारे पशु और सुन्दर स्त्रियाँ भी एक ही मनुष्य को दे दी जाएँ, तो भी वे सब उसके लिए पर्याप्त नहीं होंगे। वह और अधिक चाहेगा। ऐसा समझकर, शांति बनाए रखो और भोग की इच्छा का दमन करो॥ 51॥
 
‘Even if the entire earth filled with gems, all the gold in the world, all the animals and beautiful women are given to a single man, even then all of them will not be enough for him. He will want more. Understanding this, maintain peace and suppress the desire for enjoyment.॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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