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mahabharat 1.75.50: विषय-भोगों को भोगने से विषय-भोगों की इच्छा कभी शांत नहीं होती। जैसे घी की आहुति देने पर अग्नि और अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे ही वह और भी बढ़ती है।॥50॥   |   mahabharat अध्याय 1.75: दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 75: दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  1.75.50 
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
विषय-भोगों को भोगने से विषय-भोगों की इच्छा कभी शांत नहीं होती। जैसे घी की आहुति देने पर अग्नि और अधिक प्रज्वलित होती है, वैसे ही वह और भी बढ़ती है।॥50॥
 
‘The desire for sensual pleasures can never be appeased by enjoying sensual pleasures. Like a fire that burns more when ghee is offered as oblation, it only increases.’॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)