श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 75: दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  1.75.41 
यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुने:।
कामार्थ: परिहीणोऽयं तप्येयं तेन पुत्रका:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
'पुत्रो! अब तक मैं दीर्घकालीन यज्ञों में लगा रहा हूँ और अब शुक्राचार्य के शाप से मुझमें वृद्धावस्था आ गई है, जिसके कारण मेरी काम-वृत्ति नष्ट हो गई है। इसी कारण मैं दुःखी हूँ॥ 41॥
 
'Sons! Till now I have been engaged in performing long-term yagnas and now due to the curse of sage Shukracharya, old age has overtaken me, due to which I have lost my manly efforts in the form of sex. This is why I am distressed.॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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