श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 75: दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  1.75.33-34 
अतिभक्त्या पितॄनर्चन् देवांश्च प्रयत: सदा।
अन्वगृह्णात् प्रजा: सर्वा ययातिरपराजित:॥ ३३॥
तस्य पुत्रा महेष्वासा: सर्वै: समुदिता गुणै:।
देवयान्यां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
महाराज ययाति किसी से भी पराजित होने वाले नहीं थे । वे सदैव अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखते थे तथा बड़ी श्रद्धा से देवताओं और पितरों की पूजा करते थे और समस्त प्रजा पर दया करते थे । महाराज जनमेजय ! देवयानी और शर्मिष्ठा के गर्भ से राजा ययाति के महाधनुर्धर पुत्र उत्पन्न हुए । वे सभी समस्त गुणों के भण्डार थे । 33-34॥
 
Maharaj Yayati was not going to be defeated by anyone. He always kept his mind and senses under control and worshiped the gods and ancestors with great devotion and was kind to all the people. Maharaj Janamejaya! King Yayati's great archer son was born from the womb of Devayani and Sharmistha. All of them were the storehouse of all virtues. 33-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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